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खाण्डल विप्र: उत्पत्ति एवं गौरव गाथा

वैदिक वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण थे - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। कालान्तर में ब्राह्मण वर्ण से ही विभिन्न ब्राह्मण जातियों का विकास हुआ। कालांतर में इनके भी अनेक भेद उपभेद होते गए। राजस्थान में पारीक, गुर्जर गौड़, खाण्डल, दाधीच, सिखवाल आदि तटवर्ती ब्रह्मावर्त के ऋषि महर्षियों की वंश परम्परा से उद्भूत होकर ही राजस्थान में विकसित हुई हैं। बाद में छः न्याती ब्राह्मण भारत के अन्य प्रान्तों में और विदेशों में भी बस गए।

खाण्डलविप्र (खण्डेलवाल ब्राह्मण) जाति के मूल पुरुष महर्षि भारद्वाज हैं। आपने महर्षि विश्वामित्र के पुत्र शोक को दूर करने के लिए एक सौ मानस पुत्रों को उत्पन्न किया था ...

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