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भगवान परषुरामजी की आरती
।। परषुरामाय नम:।।

जय भृगुनन्दन, दृष्टनिकंदन जन-जन हितकारी।
वीर तपस्वी हे ओजस्वी, जीवन सुखकारी।। धृ ।।
पिता तुम्हारे ऋषि जमदगिन, सती रेणुका माता।
दिया ऋचीक ऋषि ने वर, तुम बने वीर विख्यात।।
चारो युग प्रताप तुम्हारा तेजपुंज बलधारी।। जय भृगुनन्दन.......

शीष जटा मुख तेज छटा, अरू कण्ठमाल साजे।
कटि मृगछाला, वक्षविषाला तिलक भाल साजे।
एक हाथ में परषु तुम्हारे कांधेपर धनुभारी।। जय भृगुनन्दन.......

कार्तवीर्य अजर्ुन राजा ने-कामधेनु थी चुरार्इ।
हने तपस्या मग्न महामुनी-दीन प्रजा लुटवार्इ।
ऐसे धर्म विरोधी मारे-पृथ्वी थी उद्धारी।। जय भृगुनन्दन.......

दिव्य धनुष्य दे रामचंद्र को-बलत्रेता में बढ़ाया।
कृष्ण संग द्वापर में कौरव पांडव को समझाया।
कलयुग में हिमगिरी के उपर-करते हो तप भारी।। जय भृगुनन्दन.......

ऋषियों ने वरदान दिया जो दर्ष तुम्हारा पावे।
ऋद्धि-सिद्धि पावे कुल वृद्धि उन पर विपद न आवे।
मिटे दीनता-बढ़े मनोबल पुरूष लाभ हो भारी।। जय भृगुनन्दन.......

परषुराम बलधाम तुम्हारी आरती जो कोर्इ गावे।
सफल मनोरथ होवे उनका मन वांछित फल पावे।
तुम रक्षक हो सदा हमारे - हम है शरण तुम्हारे।। जय भृगुनन्दन.......