Khandal Vipra Samaj , Jodhpur

Member Login
New User Member Click Here
About Us > History
खाण्डल विप्र: उत्पत्ति एवं गौरव गाथा

वैदिक वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण थे - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। कालान्तर में ब्राह्मण वर्ण से ही विभिन्न ब्राह्मण जातियों का विकास हुआ। कालांतर में इनके भी अनेक भेद उपभेद होते गए। राजस्थान में पारीक, गुर्जर गौड़, खाण्डल, दाधीच, सिखवाल आदि तटवर्ती ब्रह्मावर्त के ऋषि महर्षियों की वंश परम्परा से उद्भूत होकर ही राजस्थान में विकसित हुई हैं। बाद में छः न्याती ब्राह्मण भारत के अन्य प्रान्तों में और विदेशों में भी बस गए।

खाण्डलविप्र (खण्डेलवाल ब्राह्मण) जाति के मूल पुरुष महर्षि भारद्वाज हैं। आपने महर्षि विश्वामित्र के पुत्र शोक को दूर करने के लिए एक सौ मानस पुत्रों को उत्पन्न किया था, जिन्हें महर्षि विश्वामित्र ने दत्तक पुत्रों के रूप में स्वीकार किया और वेदों का विद्वान तथा वैदिक कर्मकाण्ड में प्रवीण बनाया। विश्वामित्र ने एक विजाजीय शुनः शेष नाम के बालक को भी पुत्र बना लिया। महर्षि विश्वामित्र ने अपने सौ दत्तक पुत्रों को आदेश दिया कि वे शुनः शेष को अपने बड़े भाई के रूप में स्वीकार करें। इस प्रश्न पर सौ भाईयों में मतभेद हो गए। बड़े पचास भाईयों ने पोषक पिता विश्वामित्र के इस आदेश को मानने से इन्कार कर दिया। शेष पचास भाईयों ने जिनमें सबसे बड़े मधुच्छन्द थे, शुनः शेष को ज्येष्ठ भ्राता मान लिया। अपना आदेश न माननेवाले पचास दत्तक पुत्रों को विश्वामित्र ने म्लेच्छ हो जाने का श्राप दिया और पोषक पिता के आदेश का पालन कर शुनः शेष को बड़ा भाई मान लेने वाले मधुच्छन्द आदि छोटे पचास पुत्रों को यशस्वी बनने का आशीर्वाद दिया। ये सभी वेदों के ज्ञाता, तपस्वी और वैदिक कर्मकाण्ड में निष्णात बने। ये सभी भाई मालवद (मालखेत) पर्वत (लोर्हागल) पर रहने लगे। वेदों का अध्ययन करना- करवाना और यज्ञ करना - करवाना ही इनका मुख्य कार्य था। शेष समय में तपस्या में व्यतीत करते थे। मधुच्छन्दादि ऋषि गृहस्थ थे। उनके साथ उनके परिवार भी रहते थे। ये मधुच्छन्दादि पचास ऋषि ही खाण्डल विप्र समाज के वंशप्रवर्तक थे।

‘खाण्डलविप्र‘ इस नाम के पीछे एक घटना है। परशुरामजी ने इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया और विजयी हुए। इसके बाद वे अपने पितामह ऋचीक ऋषि के पास गए और उन्हें अपने शौर्य, पराक्रम और विजयी की गाथा सुनाई। तब ऋचीक ऋषि ने परशुरामजी से कहा - ‘‘क्षमा ही ब्राह्मण का सहज धर्म है। क्षत्रियों के वध से तुम्हारे ब्राह्मणत्व का ह्नास हुआ है, इसलिए आप विष्णुयाग करके उसे पुनः प्राप्त करें। परशुरामजी ने अपने पितामह की आज्ञा का पालन करने के लिए अर्बुदांचल (अरावली पर्वत)े की घाटी में स्थित लोहार्गत तीर्थ में विष्णुयाग किया। इस यज्ञ में कश्यप को आचार्य बनाया गया, वशिष्ठ अध्वर्यु बनें और मधुच्छन्दादि ऋषियों ने ऋत्विक का कार्य किया। कहा जाता है इस पचास भाईयों में से एक किसी कारणवश इस विष्णुयाग में सम्मिलित नहीं हो पाया था। यज्ञ सम्पन्न होने पर परशुरामजी ने सभी को दक्षिणा दी, लेकिन मधुच्छन्दादि ऋषियों ने दक्षिणा लेना स्वीकार नहीं किया। तब आचार्य कश्यप ने इनसे कहा - ‘‘आप लोगों को दक्षिणा अवश्य लेनी चाहिए क्योंकि आपके दक्षिणा न लेने के कारण यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाएगा। इस यज्ञ के यजमान तो ब्राह्मणों के पोषक हैं। आप दक्षिणा लेवें, जिससे यज्ञ पूर्ण और सफल हो सकें।‘‘ तब मधुच्छन्दादि ऋषि दक्षिणा स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए। तब तक परशुरामजी ने सर्वस्व दान कर दिया था। अतः दक्षिणा कैसे दी जावें, यह समस्या उपस्थित हो गई। तब सोने की यज्ञवेदी के सात टुकडे़ किये गये। फिर इनमें से प्रत्येक टुकड़े के फिर सात टुकड़े किए गए। इस प्रकार स्वर्ण निर्मित यज्ञवेदी के उनचास टुकडे हुए और मधुच्छन्दादि प्रत्येक ऋषि को एक-एक टुकड़ा दक्षिणा के रूप में मिला।

इस घटना के आधार पर ही मधुच्छन्दादि ऋषियों के वंशजों का नाम खाण्डल हुआ क्योंकि यज्ञवेदी के खण्ड (टुकडे) ग्रहण करने के कारण मधुच्छन्दादि खाण्डल कहलाये। खाण्डल ऋषियों की सन्तानों को खाण्डल कहा गया। खण्डेलवाल वैश्य भी होते हैं। इस सन्दर्भ में यह प्रमाण मिलता है कि खण्डल ऋषियों से जिस वैश्य ने यज्ञवेदी के स्वर्ण खण्ड खरीदे थे, वह भी खण्डल वैश्य कहलाया और उसके वंशज खंडेलवाल वैश्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। मधुच्छन्दादि ऋषियों का एक भाई यज्ञ में सम्मिलित नहीं हो पाया था। अतः उसे यज्ञवेदी का खंड नहीं मिला। लेकिन उसे भी सभी भाईयों के समान ही खंडल कहा गया और उसकी संतान भी खांडल विप्र कही गयी।

खंडेलवाल ब्राह्मणों के वेद, गोत्र, प्रवर आदि पर भी विचार करना उपयोगी होगा। ब्राह्मण वेदों का अध्ययन करते थे। कालान्तर के एक वेद के चार वेद हुए और उनकी एक हजार से भी अधिक शाखाएं हुई। ऋषियों के विभिन्न समूह उस वेद की उस शाखा का विशेष अध्ययन करते थे, जिस वेद से और शाखा से उनका सम्बन्ध होता था। खाण्डल विप्रों का वेद शुक्ल यजुर्वेद हैं। उसकी माध्यन्दिनी वाजसनेयी शाखा का विशेष अध्ययन हमारे पूर्वज ऋषि विशेष रूप से करते रहे हैं। अतः हमारी वैदिक पहचान शुक्ल यजुर्वेदान्तर्गत माध्यन्दिनी वाजसनेयी शाखा के अन्तर्गत हैं। हमारे गोत्र ऋषियों से प्रारंभ होते हैं। खण्डेलवाल ब्राह्मणों के गोत्र प्रवर्तक निम्नलिखित 23 ऋषि है - 1. अंगिरस 2. जैमिनी 3. पाराशर 4. कृष्णात्रेय 5. वृतकौशिक 6. भारद्वाज 7. कौशिक 8. गौतम 9. वशिष्ठ 10. सांकृति 11. जमदग्नि 12. वैयाघ्रपद 13. शांडिल्य 14. कश्यप 15. मुद्गल 16. बृहस्पति 17. वात्स्य 18. कात्यायन 19. अत्रि 20. कौडिन्य 21. गर्ग 22. अगस्त्य और 23. काण्व।
गोत्र के अलावा अपने गोत का भी ध्यान रखना चाहिए। यों तो गोत्र शब्द से ही गोत शब्द बना है। लेकिन लोक व्यवहार में गोत्र और गोत शब्द अलग अलग अर्थ देने लगे हैं। गोत्र का सम्बन्ध वंशप्रवर्तक ऋषि से होता है, जबकि गोत का सम्बन्ध किसी घटना, स्थान, देश काल आदि से होता है। कई गोत नामों का सम्बन्ध यज्ञ की विभिन्न क्रियाओं से भी है। गोत का अवंटक, शासन, न्यातआल आदि भी कहा जाता है। ऊपर बताये गये गोत्र प्रवर्तक ऋषियों के अनुसार तेईस गोत्र हैं, लेकिन खाण्डलविप्रों के वंश प्रवर्तक मधुच्छन्दादि ऋषि पचास भाई थे। अतः गोत पचास हैं।

खण्डेलवाल ब्राह्राणों के शासनादि का विवरण
  • माटोलिया

    मठमालयमासध जजाप जगदीष्वरम।
    अतो माठलयो भूमौ ब्राह्राण: ख्यातिमागत:।।1।।
    मठ नामक स्थान में बैठकर जो र्इष्वर का जप करता था वह ब्राह्राण पृथ्वी पर माठालय (माटोलिया) कहलाया।

  • बढ़ाढ़रा

    वण्टकोलं समाहत्य चाहारमनुकल्पयेत।
    ततस्तस्य समाâानं वटाहारमिति क्षितौ।।2।।
    वड वंटे इकटठे कर जो भोजन करता था इससे लोग उसको जगत में वटाहार (वढाढरा) कहने लगे।।2।।

  • सोती

    विप्रेभ्योपि ददौ धीमान वेदान साग्डाननुक्रमात।
    पाठयित्वा ततो विप्र: श्रोत्रियो विश्रुतिं गत:।।3।
    हे विप्र! जो बुद्धिमान ब्राह्राणों का छ: अंगो के साथ अनुक्रम से वेदों को पढ़ाकर दान दिया उसको लोग जगत में श्रोत्रिय (सोती) कहने लगे।।3।।

  • सामरा

    देवै: सह सदायस्य व्यवहार: प्रवत्र्तते।
    सामरस्म तु विख्यात: स्वर्गे वा क्षितिमण्डले।।4।।
    जिसका लेन देन देवताओं के साथ सदा रहा करता वह स्वर्ग में और पृथ्वी मण्डल में सामर (सामरा) नाम करके विख्यात हुआ।।4।।

  • जोषी

    ज्योतिर्विदाम्बरो धीरो यज्ञवेला ददावथ।
    ज्योतिषीति समाख्यातो देवविप्रसभासु य:।।5।।
    जो ज्योतिष शास्त्र जानने वालों में श्रेष्ठ और धीर यज्ञों का मुहूर्त देने वाला था वह देव-ब्राह्राणों की सभा में ज्योतिषी (जोसी) नाम करके विख्यात हुआ।।5।।

  • रिणवा

    रणमुद्वहते यो•सौ यज्ञध्नैदर्ैत्यपुग्डवै:।
    यज्ञसंरक्षण्ण, यडैव रणोद्वाहीं प्रथा गत:।।6।
    जो यज्ञ नष्ट करने वाले बहुत से राक्षसों से युद्ध करके यज्ञ की अच्छी तरह रक्षा किया करता उसको रणोद्वाही (रणवा) कहने लगे।।6।।

  • बीलवाल

    सुपकानि च विल्वानि यज्ञार्थ संâतानि च।
    विल्ववानथ स ख्यातो ब्राह्राणेषु द्विजोत्तम:।।7।।
    जो श्रेष्ठ पके पके विल्वफल (वेलगिरी के फल) यज्ञ के वास्तें इकटठे करके लाया करता था वह ब्राह्राणों की पंकित में उत्तम ब्राह्राण विल्ववान (वीलवाल) नाम करके विख्यात हुआ।।7।।

  • बील

    विल्वमाला च षिरसि गले च भुजयोरपि।
    विल्वमूले सिथतों यो•सौ तस्माद्विलव इति श्रुत।।8।।
    जो बिल्वों की माला षिर गले भुजाओं पर बाँधे रसहीतज्ञा था विल्व के नीचे बैठा करता था वह इस कारण से विल्व (वीलह) नाम करके विख्यात हुआ।।8।।

  • कुजवाड़

    लतागृहं समाश्रित्य जजाप परमं जप:
    कृग्जाबाडिति विख्यातो ब्राह्राणो ब्रहमवित्तम:।।9।।
    वेल चढाके जो झोपडी बना गायत्री जपता था और अतिषय करके ब्रह्राा को जानने वाला था वह ब्राह्राण कुग्जावाद (कुग्जावाड) नाम से विख्यात हुआ।।9।।

  • सेवदा

    ररक्ष सेवाधिं द्रव्यं यामदेग्नेर••ज्ञया।
    तस्मात्स: सेवधिर्नामा विख्यातो भुवि ब्राह्राण:।।10।।
    परषुराम जी की आज्ञा से जो सारे धन (खजाना) की रक्षा करता था वह पृथ्वी पर सेवधि (सेवदा) नाम से विख्यात हुआ।।10।।

  • चोटिया

    षिखा बृद्धतरा यस्य सेर्वाडे लुलिता परा।
    तस्माच्चौल इति ख्यातो भूसुरो भूमिण्डले।।11।।
    जिसकी बहुत बड़ी चोटी सारे अंग पर पडी रहा करती थी वह ब्राह्राण पृथ्वी में चौल (चोटिया) नाम से विख्यात हुआ।।11।।

  • मणडगिरा

    मण्डमागिरत नित्यं दन्तहीनो द्विजोत्तम:।
    ततो मण्डगिल: ख्यात: सर्वदा भूमिमण्डले।।12।।
    जो उत्तम ब्राह्राण दांतों के नहीं होने से नित्य मांडही को पिया करता था वह इस कारण से सदा पृथ्वी मडल में मंड गिर (मंडगिरा) नाम से विख्यात हुआ।।12।।

  • सुन्दरिया

    सुन्दरस्तुदिलो यो•सौ त्रिवल्या परिषोभते।
    तेनैतव सुन्दरो भूमौ विख्यातो विप्रसत्तम:।।
    जो सुन्दर तुन्दवाला त्रिवली करके शोभित था वह पृथ्वी पर उतम ब्राह्राण सुन्दर (सुन्दरिया) नाम से विख्यात हुआ।।13।।

  • इषनाड़ा (झखनाडि़या)

    झषनर्तनमालोक्यं परमानन्दमात्मन:।
    स मेने मनसा धीमान झषनाटय इति स्मृत:।।14।।
    जो बुद्धिवाला मच्छलियों के कूदने को देखकर बहुत ही खुष होता था आत्मा मन से प्रसन्न रहता था वो झषनाटय (झषनाड़ा) नाम से विख्यात हुआ।।14।।

  • रूँथला

    चरूस्थाली करे कृत्वा प्रजपन्मन्त्रमुत्तमम।
    अजोहवोत्तदा वन्हौ चरूस्थालील्त विश्रुत:।।15।।
    जो चरू की थाली को हाथ में लेकर उत्तम मत्र बोलकर अगिन में होम करता था वह चरूस्थली (रूथला) कहलाने लगा।।15।।।

  • गोधला

    गोधूली समये नित्य यो भुनाä मिहामति:।
    स तदव्रतप्रभावेण गोधुलीख्यातिमागत:।।16।।
    जो बहुत बुद्धिवाला गौवों के आने के समय नित्य भोजन किया करता था वह उस व्रत के प्रभाव से गोधूली (गोधला) कहाया।।16।।

  • गोरसिया

    गोतäं च पिवेत्रित्यमन्यदत्रं न भक्षयेत।
    गोरस इति विख्यातो विप्र: पुण्येन कम्र्मणा।।17।।
    जो नित्य गौकी छाछ ही पिया करता था और कोर्इ चीज नहीं खाता था वह ब्राह्राण इस पुण्यकर्म करने से गोरस (गोरसिया) नाम से बुलाया गया।।17।।

  • झूँझनोदिया

    यज्ञस्यान्ते च यो नित्यं सामवेदं स्वरानिवतम।
    धुनोति ब्राह्राण: श्रीमान झुंझुनाद इतीरित:।।19।।
    जो तेजवाला ब्राह्राण यज्ञ के अन्त में नित्य ही स्वर सहित सामवेद का गान करता था उसको झुंझुनाद (झुंझुनोदा) कहने लगे।।18।।

  • भूरभुरा

    भूगत्र्तान्यत्रकुत्रापि दृष्टवा भरति य: सदा।
    भूभरा: स तु विख्यातं: सर्वत्र सुखदो द्विज:।।19।।
    जहाँ कही पृथ्वी पर गडढ़ों को देखता था सदा उनको भर दिया करता था वह ब्राह्राण सर्वत्र सबको सुख का देने वाला भूभर (भूभरा) नाम से विख्या हुआ है।।20।।

  • बटोठिया

    वटमूलमुपाश्रित्य नैत्यंक कुरूते तु य:।
    वटोधा व समाख्या तो भूसुरेषु निरन्तरम।।20।।
    जो वट के नीचे बैठके नित्यकम्र्म करता था वह सदा ब्राह्राणों में निष्चय करके वटोधा (वटोठिया अथवा वट ओटिया) नाम से विख्यात हुआ।।20।।

  • काछवाल

    कक्षामाश्रित्य वेधास्तु जुहुयान्मन्त्रसंयुतम।
    कक्षावानिति सर्वत्र विख्यात ऋषिपुग्डव:।।21।।
    जो वेदी की कोन में बैठके मन्त्र बोलके आहुति दिया करता था वह ऋषियों में श्रेष्ठ सब जगह कक्षावान (काछवाल) नाम से विख्यात हुआ।।21।।

  • षिवोवाही

    षिवमुद्वहतेकण्ठे नित्यं भäया मुनिर्ममहान।
    षिवोद्वाहीति लोके•सिमन्तेन ख्यातो विदाम्बर।।22।।
    बहुत बड़ा मुनि जो भकित से षिवजी को हमेष: कंठ मे रखता था वो षिवोद्वाहि (सोडवा) नाम से इस लोक में विख्यात हुआ।।22।।

  • भाटीवाड़ा

    भटटस्य रूपमास्थाय युध्यते यो निरन्तरं।
    तेनैव भूतले ख्यातो भटीवानिति पणिडत:।।
    मल्ल के रूप में जो रोज कुस्ती किया करता था पृथ्वी पर वह भटीवान (भाटीवाड़ा) नाम से विख्यात हुआ भटटीवान भी कहते है।।।23।।

  • गोवला

    गा: पालयति य स्नेहत्रित्यं धम्र्मपरायाण:।
    तासामेव बलो यस्य गोबल: कथितो द्विजै:।।24।।
    जो प्यार से गौवों को पाला करता था धम्र्म में हमेषां तत्पर था और गौवों का ही उसको बल था, ब्राह्राणों ने उसका नाम गोबल (गोबल) रक्खा।।24।।

  • वषीवाल

    वषीकृत्य जनान्सर्वान वत्र्तते क्षितिमण्डले।
    तत्प्रभावात्समाख्यातो वषीवनिति भूतले।।25।।
    जो सब जनों को वष में करके वास करता था वह पृथ्वी मण्डल पर इस प्रभाव से वषीवान (वषीवाल) नाम से विख्यात हुआ।।25।।

  • मंगलहारा

    मनसा वचसा नित्यं सर्वेषामभिवाग्छति।
    मंगलं हरति यो•सौ तस्मान्मडलहारक:।।26।।
    मन से वचन से नित्य सबों का शुभ चाहता था मंगल सबको प्राप्त करता था तिस से वह मंगलहर (मंगलहारा) नाम से विख्यात हुआ।।26।।

  • बोचीवाल

    अवोचधज्ञषालाया धम्र्मान्धर्मात्मक: कवि:।
    तस्मादसौ च विख्यातो वोचिवानिति नामत:।।27।।
    जो यज्ञ में धर्मों को सुनाया करता था वह वोचिवान (वोचिवाल) नाम से विख्यात हुआ।।27।।

  • दुगोलिया

    दिवोगोलामथालम्व्य वणि्रत व्योमविस्तरं।
    तस्मादूत्र समाख्यातो धूगोल इति विद्वूर:।।28।।
    आकाष में सिथत हो करके जिसने आकाष की लम्बार्इ चौड़ार्इ का वर्णन किया है (नलिका बन्धन से आकाष के विस्तार को कहा) वह पृथ्वी पर धूगोल (दुगोलिया) नाम से विख्यात हुआ।।28।।

  • गुजावड़ा

    गुग्जावितानमाछध वटस्योपरितो बुध:।
    तत्र चोवास यो धीरो गुग्जावाट इतिश्रुत:।।29।।
    जो धीर बुद्धिवाला चिरमठियों को बेल बड पर चढ़ाकर उसमें वास कर उसको लोग गुंजावाट (गुंजावडा) कहने लगे।।29।।

  • परवाल

    प्रवालगोरवर्णष्च प्रवालैष्चैव मणिडत:।
    प्रवालमालयोपेत: प्रवाल: स च कथ्यते।।30।।
    जो मूंगे का सा गौर वर्ण वाला मूंगे के आभूषणों से शोभित भुज दंड औीर मूंगे की माला से युक्त रहता था उसको प्रवाल (परवाल) कहा।।30।।

  • हूचरा

    हूहू नामानमाहूय चानयधवेष्मनि।
    चारयामास गन्धर्व तस्माऋचरको द्विज:।।31।।
    यज्ञ मे हूहू नाम गन्धव्र को बुला के गन्धर्ववेद को गाया इससे वह ब्राह्राण हूचर (हुचय्र्या) नाम से प्रसिद्ध हुआ।।31।।

  • नवहाल

    जाम्बूदुममयं रत्नं हलं जग्राह यो द्विज:।
    चकर्ष याज्ञकीं भूमीं नवहालप्रथां गत:।।32।।
    जिसने जामुन का नया हल बनाकर यज्ञ की पृथ्वी को जोता वह ब्राह्राण नवहाल नाम से विख्यात हुआ।।32।।

  • बांठोलिया

    यज्ञवाटमुपागम्य áलिखन स्थणिडलंत तु य:।
    जजाप परमं जापं तेन वाठोलिक: स्मृत:।।33।।
    जो यज्ञ की वेदी में रंग भरकर तथा गायत्री का जप किया करता था उसको लोग वाठोलिक (वाठोलिया) कहने लगे।।33।।

  • पीपलवा

    अष्वत्थमूलमासाधं तस्यैव फलमत्ति य:।
    पिपलवानिति ख्यातो भूमौ विप्रवरस्तत:।।34।।
    पीपल के पेड़ के पास बैठा करता और बरबंटी खाया करता वह श्रेष्ठ ब्राह्राण पृथ्वी पर पीपलवान (पीपलवा) नाम से विख्यात हुआ।।34।।

  • मुछावला

    ष्ष्वश्रुभिमर्ुखमाछत्रो वत्र्तते यज्ञमण्डले।
    ष्ष्मश्रुलो हि समाख्यात: समुद्रान्तर्गतौभुवि।।35।।
    जो यज्ञ में दाढ़ी मूछों से मूंह ढका रखता था वह समुद्रों के बीच की पृथ्वी पर श्मश्रुल (मुछावला) नाम से विख्यात हुआ।।35।।

  • तिवाड़ी

    त्रिद्वारं समागम्य जजाप जननीं श्रुतीं।
    त्रिवारीति च लोके•सिमन विख्यातिमधुनागत:।।36।।
    जो तीन दरवाजे का मकान बनाके उसमें गायत्री जपा करता था वह इस लोक में त्रिवारी (तिवाड़ी) नाम से विख्यात हुआ।।36।।

  • पराषला

    पराषार्थ च यो लति यस्मात्कस्माद्धनं बहु।
    तत: पराषलो विप्रो विख्यातो भुवनत्रये।।37।।
    समिधों के वास्ते जो इधर-उधर से धन बहुत लाया करता था वह ब्राह्राण तीनों लोकों में पराषल (पराषला) नाम से विख्यात हुआ।।37।।

  • घाटवाल

    घटमाश्रित्य कुण्डस्य भारत्या मन्त्रमुज्जनपन।
    घटवानितिविप्रेष: सर्वत्र विदितो áभूत।।38।।
    जो वेदी के किनारे बैठकर सरस्वती जी का मंत्र जपता था वह सब जगह घटवान (घाटवाल) नाम से विख्यात हुआ।।38।।

  • बणसिया

    वने च निवसन्यो वै मन्त्रं च द्वादषात्मक।
    जजाप परयाभäया वानस्थो विश्रुतो भुवि।।39।।
    जो वन मे वस कर बहुत भकित के साथ बारह हरफों वाले ( ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय) मंत्र जप करता था उसको बनाश्रय (वनसिया अथवा वनसायी) पृथ्वी पर कहले लगे।।39।

  • सिंघोटा

    सिंहपृष्ठं समारूá भगवत्या: प्रसादत:।
    सर्वत्रा•टति यो धीमाँस्तत: सिंहोटक: स्मृत:।।40।।
    जो बुद्धिवाला देवी जी की कृपा से सिंह की पीठ पर चढ़कर नित्य सब जगह फिरा करता था वह सिंहोटक (सिंहोटिया) कहाया।।40।।

  • भुरटिया

    भूर्भटं च तृणं सम्यगादाय शयनं रचेत।
    भूर्भट इति विख्यातो बभूव धरणीतले।।42।।
    जो भरूंट घास को बिछाकर सोया करता था वह पृथ्वी पर भूर्भट (भरूटिया) नाम से विख्यात हुआ।।41।।

  • टंकहारी

    टंक टंक समादाय चाहारं कुरूते सदा।
    टंकहारीति विख्यातो लोके च परमर्षिभि:।।42।।
    जो नित्य चार-चार मांसे की गस्सी लेके खाया करता वह परम ऋषियों करके इस लोक में टंकहारी नाम से विख्यात हुआ।।42।।

  • अजमेरिया

    अजे ब्रह्रााणि यो मेघां सजोज्य कम्र्म संचरते।
    अजमेधा महीपृष्ठे सर्वत्र विदितो áभूत।।43।।
    जो परब्रह्रा में बुद्धि लगाके कर्म करता था वह पृथ्वी पर सब जगह अजमेघा (अजमेरिया) नाम से विख्यात हुआ।।43।।

  • डीडवानिया

    डिंंडमं च पुरस्कृत्य विचार महीतले।
    डींडिमवानिति ख्यातो भूसुरो भूमिमण्डले।।44।।
    जो डिंडम (डोरू) वाजे को लेकर पृथ्वी पर विचरा करता वह ब्राह्राण डिंडमान (डीडवाणा) नाम से पृथ्वी पर विख्यात हुआ।।44।।

  • निढ़ाणिया

    निढ़ाणियानिधनांधि च भूयासि समादाय धनेष्वरात।
    विभज्य पांचकेभ्यो•दात्रिधानि यो हि सोप्यभूत।।46।।
    जो बहुत से खजाने कुबेर से लाकर पाचकों (रसोइया) को बाँटा करता उसको निधानीय (निटाण्या) कहने लगे।।46।।

  • डाभडा-डावस्या

    दंभभारं समादाय तस्यास्तरणमाकरोत।
    तेनैव हेतुना विप्र: दर्भषायीति विश्रुत:।।46।।
    जो डाभ बिछाके सोया करता था वह दर्भषायी (डाभडा डावस्या) नाम से विख्यात हुआ।।46।।

  • खडभडा-निठुरा

    निष्ठुरं वचनं यस्तु वदत्येव जनेषिवह।
    तन्नाम निष्ठुरा लोके बभूव परमादभुतम।।47।।
    जो मनुष्यों को हमेषा कडा वचन कहा करता था इस लोक में उसका परम अद्धत निष्ठुर (निठुर-खडभडा) नाम हुआ।।47।।

  • वोहरा - भूसुरा

    व्यवहारप्रियो लोके व्यवहरति जनेषिवह।
    व्यवहारीति विप्रो•सौ सततं ख्यातिमागत:।।48।।
    जो संसार में लेन देन का व्यवहार करता था और व्यवहार ही उसको प्यारा था वह ब्राह्राण निरन्तर व्यवहारि (बोहरा-भूसुरा) नाम से विख्यात हुआ।।48।।

  • वांटण

    आयान्तं ब्राह्राणं दृष्टवा तस्मै यच्छति यो धनं।
    तस्मात्तु विप्रो विख्यातो बिभाजीति जनेषु स:।।49।।
    जो आये हुए ब्राह्राण को देखकर उसको धन दिया करता था वह मनुष्यों में विभाजि (बांटणा) नाम से विख्यात हुआ।।49।।।

  • शकुन्या

    शाकुनानि च सर्वाणि विचचार विचारयन।
    शाकुनीति ततो लोके विख्यातिं गतवान्मुनि:।।50।।
    जो सारे शकुनों को विचारता हुआ विचरता था वह मुनि लोक में शाकुनि (षकुन्या) नाम से विख्यात हुआ।।50।।