Khandal Vipra Samaj , Jodhpur

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About Us > Things To Do
  • शंकर को बिल्वपत्र, विष्णु को तुलसी, गणेष को दूर्वा, लक्ष्मी को कमल, दुर्गा को रक्त पुष्प प्रिय है।
  • षिवजी को षिवरात्रि के सिवाय कुंकुम नहीं चढ़ती।
  • षिवजी को कुंद, विष्णु को धतूरा, देवी को आक तथा मदार और सूर्य को तगर के फूल नहीं चढ़ावें।
  • अक्षत देवताओं को तीन बार, पितरों को एकबार धोकर चढ़ावें।
  • नये बिल्वपत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्वपत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते है।
  • विष्णु को चावल, गणेष को तुलसी, दुर्गा और सूर्य को बिल्वपत्र नहीं चढ़ावे।
  • पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। किंतु, बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। सडा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावें।
  • गणेष को तुलसी भाद्र पद शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती है।
  • पांच रात्रि तक कमल का पुष्प बासी नहीं होता।
  • दस रात्रि तक बिल्वपत्र बासी नहीं होता।
  • ग्यारह रात्रि तक तुलसीपत्र बासी नहीं होता।
  • सभी धार्मिक कार्यों में पत्नी को दाहिने भाग में बैठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।
  • पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।
  • पूर्वाभिमुख बैठकर अपनी बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी और शंख, जलपात्र एवं पूजन-सामग्री रखें। घी का दीपक अपने बायीं ओर तथा देवता के दाहिनी ओर रखें एवं चावल पर दीपक रखकर प्रज्जवलित करें तथा हाथ धो लेवें।
  • षिवजी जलहरी उत्तराभिमुख रखें।
  • घर में पूजा करनेवाला एक ही मूर्ति की पूजा नहीं करें, अनेक देवी-देवताओं की पूजा करें। घर में दो षिवलिंग की पूजा नहीं करें तथा पूजा स्थान पर तीन गणेष नहीं रखें। दो शंख नहीं रखें।
  • शालिग्राम की मूर्ति जितनी छोटी हो वह ज्यादा फलदायक है।
  • कुषा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव-कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।
  • मंगल कार्यों में कुमकुम का तिलक प्रषस्त माना जाता है। पूजा में टूटे हुए अक्षत के टुकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए।
  • सित्रयों के बायें हाथ में रक्षाबंधन किया जाता है।
  • पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली मत डालो। लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए। नख स्पर्ष से वस्तु अपवित्र हो जाती है, देव-पूजा के योग्य नहीं रहती।
  • तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए। वह मदिरा समान होता है।
  • आचमन तीन बार करने का विधान है। इसके त्रिदेव ब्रह्राा-विष्णु महेष प्रसन्न होते है। दाहिने कान का स्पर्ष करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है।
  • देवताओं को अंगूठे सेनही मले चकले पर से चंदन लेकर कभी नहीं लगावें। उस छोटी कटोरी या बांयीं हथेली पर रखकर लगावें।
  • पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए।
  • भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगो की सात बार आरती उतारें।
  • भगवान की आरती समयानुसार जो घंटा, नगारा, झांझरा, थाली घडावल, शंख इत्यादि बजते हैं, उसकी ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल के कीटाणु नष्ट हो जाते है। नाद ब्रह्रा होता है। नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती है। उसमें असीम शकित होती है।
  • लोहे के पात्र में भगवान को नेवैध अर्पण नहीं करें।
  • हवन में अगिन प्रज्जवलित होने पर ही आहुति दें। समिधा अंगूठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए तथा दस अंगुल लम्बी होनी चाहिए। छाल रहित या कीडे लगी हुर्इ समिधा यज्ञ कार्य में वर्जित है। पंखे आदि से कभी हवन की अगिन को प्रज्जवलित नहीं करें।
  • मेरूहीन माला या मेरा का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए। माला रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गर्इ है। माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए।
  • किसी भी जप के बाद उसका दषांष हवन करना चाहिए।
  • जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें। तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए। माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए।
  • जप करते हुए जल में सिथत व्यकित, दोड़ते हुए, श्मषान से लोटते हुए व्यकित को नमस्कार करना वर्जित है। बिना नमस्कार किए आषीर्वाद देना वर्जित है। एक हाथ से प्रणाम नहीं करना चाहिए। जप करते समय होंठ व जीभ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांषु जप कहते है। इसका फल सौगुणा फलदायक होता है। जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े से या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्ष कर नेत्रों से लगाना चाहिए।
  • सोए हुए व्यकित का चरण-स्पर्ष नहीं करें।
  • बड़ो को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर को दाहिने हाथ से और उनके बांये पेर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।
  • संक्रानित, द्वादषी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्धया के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध है।
  • दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए।
  • यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल नहीं।
  • शनिवार को पीपल को जल चढ़ाना, परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, किन्तु रविवार को परिक्रमा नहीं करनी चाहिए।
  • कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को सित्रयां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटे। यह उत्तम नहीं माना जाता है। भोजन-प्रसाद को लांघना नहीं चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए।
  • देवता की प्रतिमा देखकर अवष्य प्रणाम करें।
  • किसी को भी कोर्इ वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।
  • एकादषी, अमावस्या, कृष्ण चतुर्दषी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढी) नहीं करावें।
  • बिना यज्ञोपवित या षिखा-बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता है। यदि षिखा नहीं हो तो स्थान को स्पर्ष कर लेना चाहिए।
  • टूटे हुए शीषे में मुख नहीं देखें।